Sunday, 6 May 2012

गोविंद शर्मा का "व्यंग्य"

दीमकें दिमाग की.....................................

                     एक स्वर्गीय गायक के बारे में अभी पढा कि यह अपना धन बैंक में नही रखता था उसे डर था कि वहां से कोई लूट ले जायेगा या बैक में आग लग जोयगी तो उसका भारी नुकसान होगा। यह पढकर दूसरों की तरह मुझ भी हंसी आई थी। पर आज एक नई खबर पढ कर सोच रहा हूं कि बैंकों का बांकपन काफी आगे ?निकल गया है। जिम्मेदारी वहां से "बंक" मारे हुए है रायपुर के एक बैंक के लांकर में पडे़ नोट दीमकें चाट गई। अगर कोई बैंक कर्मी पचास रूपये "अगर वह लोन का कमीशन का न होता" का नोट चाट जाता तो तुरंत निलंबित कर दिया जाता। जांच शुरू हो जाती । अब दीमकों का क्या करोंगे?
                     एेसे मौकों पर मैं जागरूक नागरिक, समाजसेवी, जनसेवी, बुद्धिजीवी होने के कारण जांच के लिए अपने आप आगे आ जाता हूं। लोग यही कहेंगे कि बैक वाले दोषी नहीं है।बिल्कुल नही जनाब। मैनें पढ रखा है कि यहां बैंक सिस्टम लाते समय अंग्रेज यह नियम साथ में नहीं लाये थे कि बैंक मैं दीमाकों पर दवा छिड़की जाए। बैंक वाले खर्चा बढाने की पहल क्यों करें? पर्यावरणविद् भी कम दोषी नहीं है। उन्होंने पेपरलैस पेपरलैस का इतना शोर मचाया कि बैंकों का कंप्यूटरीकरण हो गया। दीमाकों को चाटने के लिए फाइलें वगैरह नहीं मिली नोट चाटने लगी। उन्हें नोट चाटने का ख्याल कैसे आया? कुछ लोग नेताआे आैर अफसरों, निगमों, बोर्डों, समितियों के सदस्यों को "सफेद हाथी" कहने लगे थे। इससे सफेद हाथियों को बड़ी शर्म आई। फलस्वरूप हमारे देश के सभी वनों से सफेद हाथी लुप्त हो गये। इस जमात को कुछ लोग दीमकें भी कहने लगे। दीमकों ने दिमाग लगाया आैर वे भी नोट चाटने लगी। कुछ का कुछ सुनने समझने से एेसा ही होता है। बात शुरू हुई थी कि देश में बाघों की संख्या बढाई जाए। सुना बाघ । दिन व दिन हर क्षेत्र में बाघ बढ रहें है। नोटों से कई तरह के स्वाद हासिल हो सकते हैं। एक विशेषज्ञ से पूछा तो बोले : मैं सब कुछ खा चुका हूं। उड़ने वालों में पतंग, चौपायों में मेंज आैर दोपायों में आदमी को छोड़ा है। पर सीधे नोट को खाने में कैसा स्वाद है यह नहीं जानता।
                  पहले बैंक वाले लोगों को बैक में राशि जमा करवाने के लिए आकर्षक विज्ञापनों के जरिए संदेश भेजा करते थे। एक विज्ञापन में था : एक किसान ने अपने जमा रूपये चोरों से बचाने के लिए जमीन में दबा दिए थे। वे मिट्टी हो गये। एक ने भूसे के ढेर में छिपाए थे। उन्हें उसकी बकरी चर गई। अब इस तरह के विज्ञापन नहीं दिये जा सकेंगे। निसंदेह लोग भागकर जाएंगे आैर अपने लांकर सभालेंगे। इससे पहले ही विज्ञापन दिया जाना चाहिए कि बैक पर दीमकों का हमला। हमलावरों ने एक बाद प्राईवेट लांकरों का छुआ ही नहीं, केवल सरकार आैर सार्वजनिक संपत्ति हो हड़पा ।
                 अब तक आप जिसे सभी गलत बता रहे थे, लगता है वह अब सही होने जा रहा है। सभी कहते है कि विदेशी बैंक में जमा भारतीय का पैसा देश में वापस लाया जाए। क्या आपने कभी सुना है कि किसी िस्वस बैंक में रखे नोट दीमकें चाट गई? नहीं न? तो यह मानकर चलिए कि जिनका धन वहां जमा है, वे पक्के देशभक्त हैं। देश की दौलत बचाने के लिए ही उन्होंने वहां जमा करवाया है। उनकी वह खून पसीने की कमाई देश में होती तो दीमकें चट कर जाती। देश को इन महापुरूषों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।
                 यह तो मेरा लोकपाल है। उस बैक ने को कह दिया कि लाकर धारक ने अखवार में लपेटकर रूपये रखे थे, इसलिए दीमकें चाट जाती है। लगता है दीमकें वहां अखवार पर पढनें आई थी, नोट देखकर उनके मुंह में पानी आ गया साफ है कि इस नुकसान का जिम्मेवार मीडिया भी है अखवार पर उसके आपत्ति जनक संवाद मुकदमा चलना चाहिए। सरकार क्या कहती है? क्या कोई मुकदमा चलेगा? यदि हां तो गवाह या मुजरिम के रूप में दीमकों को जिंदा रखना होगा। जिन्हें नोट खाने की आदत पड़ जाती है। उनकी भूख साधारण कागज से नहीं मिटती है। इसलिए उन्हें नोट चटवाकर ही जिंदा रखा जाए। विदेशी आतंकवादियों पर मुकदमा चलाने के लिये भी तो हम करोड़ों खर्चते हैं, दीमकें तो हमारी अपनी है। उनकी रगों में हमारे नोटों का खून है। उन्होंने हमारे बैंकों को पब्लिसिटी दी है। हां, उन्हें फांसी की सजा हरगिज न दी जाए। वरना लोगों को लगेगा कि इन धन आैर समय फिजूल ही खर्च हुआ है।

गोविंद शर्मा, ग्रामोत्थान विद्यापीठ,
संगरिया




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