Friday, 25 May 2012

साहित्यिक सम्मान : गोविंद शर्मा

राष्ट्रधर्म पत्रिका लखनउ द्वारा आयोजित "श्री राधेशयाम चितलांगिया स्मृति अखिल भारतीय हिन्दी कहानी प्रतियोगिता 2012" के घोषित परिणाम के अनुसार गोविंद शर्मा की कहानी "भानसिंह का परिवार" को रूपये पांच हजार का पुरस्कार प्राप्त हुआ है। कहानी का विषय सांप्रदायिक एकता है। राष्ट्रधर्म के संपादक आनन्द मिश्र "अभय" के अनुसार अक्तूबर के अंत में लखनउ में पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित किया जायेगा जिसमें गोविंद शर्मा को सम्मानित किया जायेगा।




Monday, 7 May 2012

रचनाकार: गोविंद शर्मा

व्यंग्य : फरारी की सवारी,

गोविंद शर्मा साहित्यिक सम्मान


व्यंग्यकार को मानद उपाधि

Posted On January - 29 - 2012

साहित्य जगत

संगरिया के बाल साहित्यकार एवं व्यंग्यकार गोविंद शर्मा को उनके साहित्यिक अवदान के उपलक्ष्य में विक्रम शिला विद्यापीठ द्वारा उज्जैन (मध्यप्रदेश) में  पिछले दिनों आयोजित दीक्षांत समारोह में ‘विद्या वाचस्पति ‘; की मानद उपाधि प्रदान की गई। इस अवसर पर अनेक साहित्यकारों, पुरातत्ववेत्ताओं, इतिहासकारों के अलावा कुलपति डा. तेज नारायण कुशवाहा, आयोजन प्रमुख संतश्री डा. सुमन भाई, कुलसचिव डा.देवेंद्रनाथ साह, डा. रामनिवास ‘मानव’ एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. मोहन गुप्त भी उपस्थित थे। समारोह में गोविंद शर्मा के साहित्यिक योगदान की चर्र्चा करते हुए कहा गया कि इन्होंने अब तक 35 पुस्तकों का लेखन किया है। इनमेें 26 बालकथा संग्रह, ज्ञानविज्ञान, बालकाव्य, बाल उपन्यास, चार जीवनियां एवं दो व्यंग्य संग्रहों ‘कुछ नहीं बदला’ और ‘जहाज केनये पंछी’ सम्मिलित हैं। इन्हेंअनेक संस्थाओं से पुरस्कार/सम्मान के अलावा भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से ‘भारतेन्दु पुरस्कार’ तथा राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर से ‘शंभूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार’ मिल चुका है। हिन्दी के अलावा अंग्रेजी, पंजाबी एवं अन्य भारतीय भाषाओं  में इनकी रचनाओं का अनुवाद हुआ है तथा कई रचनाएंं विभिन्न पाठ्यक्रमों में  शामिल की गई हैं।                (ट्रिन्यू)

सम्मानित समारोह


Thursday, April 8, 2010


बाल साहित्यकार गोविंद शर्मा भोपाल में सम्मानित



बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र, भोपाल (म.प्र.) द्वारा आयोजित समारोह में बाल साहित्यकार गोविन्द शर्मा को उनके समग्र योगदान के लिए ‘भीष्मसिंह चौहान स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ प्रदान कर सम्मानित किया गया। भोपाल में
आयोजित इस सम्मान समारोह की अध्यक्षता मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान सांसद कैलाश जोशी ने की तथा मुख्य अतिथि के रूप में मध्यप्रदेश की स्कूल शिक्षा मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस पधारीं। समारोह में केन्द्र के संचालक महेश सक्सेना ने केन्द्र की गतिविधियों का परिचय दिया। विशिष्ट अतिथि देवेन्द्र दीपक (पूर्व निदेशक, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी) ने उपस्थित साहित्यकारों का स्वागत किया। सांसद कैलाश जोशी शॉल ओढ़ा कर एवं श्रीमती अर्चना चिटनिस ने प्रतीक चिन्ह देकर गोविन्द शर्मा को सम्मानित कया। श्रीमती अर्चना चिटनिस ने अपने उद् बोधन में कहा कि अब सभी को शिक्शा का मौलिक अधिकार प्राप्त हो गया है। कोई भी सरकार अकेली सभी को शिक्षित नहीं कर सकती। इसके लिए जन सहयोग, विशेषत: बालसाहित्य के रचनाकारों की भूमिका महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। 

Sunday, 6 May 2012

गोविंद शर्मा का "व्यंग्य"

दीमकें दिमाग की.....................................

                     एक स्वर्गीय गायक के बारे में अभी पढा कि यह अपना धन बैंक में नही रखता था उसे डर था कि वहां से कोई लूट ले जायेगा या बैक में आग लग जोयगी तो उसका भारी नुकसान होगा। यह पढकर दूसरों की तरह मुझ भी हंसी आई थी। पर आज एक नई खबर पढ कर सोच रहा हूं कि बैंकों का बांकपन काफी आगे ?निकल गया है। जिम्मेदारी वहां से "बंक" मारे हुए है रायपुर के एक बैंक के लांकर में पडे़ नोट दीमकें चाट गई। अगर कोई बैंक कर्मी पचास रूपये "अगर वह लोन का कमीशन का न होता" का नोट चाट जाता तो तुरंत निलंबित कर दिया जाता। जांच शुरू हो जाती । अब दीमकों का क्या करोंगे?
                     एेसे मौकों पर मैं जागरूक नागरिक, समाजसेवी, जनसेवी, बुद्धिजीवी होने के कारण जांच के लिए अपने आप आगे आ जाता हूं। लोग यही कहेंगे कि बैक वाले दोषी नहीं है।बिल्कुल नही जनाब। मैनें पढ रखा है कि यहां बैंक सिस्टम लाते समय अंग्रेज यह नियम साथ में नहीं लाये थे कि बैंक मैं दीमाकों पर दवा छिड़की जाए। बैंक वाले खर्चा बढाने की पहल क्यों करें? पर्यावरणविद् भी कम दोषी नहीं है। उन्होंने पेपरलैस पेपरलैस का इतना शोर मचाया कि बैंकों का कंप्यूटरीकरण हो गया। दीमाकों को चाटने के लिए फाइलें वगैरह नहीं मिली नोट चाटने लगी। उन्हें नोट चाटने का ख्याल कैसे आया? कुछ लोग नेताआे आैर अफसरों, निगमों, बोर्डों, समितियों के सदस्यों को "सफेद हाथी" कहने लगे थे। इससे सफेद हाथियों को बड़ी शर्म आई। फलस्वरूप हमारे देश के सभी वनों से सफेद हाथी लुप्त हो गये। इस जमात को कुछ लोग दीमकें भी कहने लगे। दीमकों ने दिमाग लगाया आैर वे भी नोट चाटने लगी। कुछ का कुछ सुनने समझने से एेसा ही होता है। बात शुरू हुई थी कि देश में बाघों की संख्या बढाई जाए। सुना बाघ । दिन व दिन हर क्षेत्र में बाघ बढ रहें है। नोटों से कई तरह के स्वाद हासिल हो सकते हैं। एक विशेषज्ञ से पूछा तो बोले : मैं सब कुछ खा चुका हूं। उड़ने वालों में पतंग, चौपायों में मेंज आैर दोपायों में आदमी को छोड़ा है। पर सीधे नोट को खाने में कैसा स्वाद है यह नहीं जानता।
                  पहले बैंक वाले लोगों को बैक में राशि जमा करवाने के लिए आकर्षक विज्ञापनों के जरिए संदेश भेजा करते थे। एक विज्ञापन में था : एक किसान ने अपने जमा रूपये चोरों से बचाने के लिए जमीन में दबा दिए थे। वे मिट्टी हो गये। एक ने भूसे के ढेर में छिपाए थे। उन्हें उसकी बकरी चर गई। अब इस तरह के विज्ञापन नहीं दिये जा सकेंगे। निसंदेह लोग भागकर जाएंगे आैर अपने लांकर सभालेंगे। इससे पहले ही विज्ञापन दिया जाना चाहिए कि बैक पर दीमकों का हमला। हमलावरों ने एक बाद प्राईवेट लांकरों का छुआ ही नहीं, केवल सरकार आैर सार्वजनिक संपत्ति हो हड़पा ।
                 अब तक आप जिसे सभी गलत बता रहे थे, लगता है वह अब सही होने जा रहा है। सभी कहते है कि विदेशी बैंक में जमा भारतीय का पैसा देश में वापस लाया जाए। क्या आपने कभी सुना है कि किसी िस्वस बैंक में रखे नोट दीमकें चाट गई? नहीं न? तो यह मानकर चलिए कि जिनका धन वहां जमा है, वे पक्के देशभक्त हैं। देश की दौलत बचाने के लिए ही उन्होंने वहां जमा करवाया है। उनकी वह खून पसीने की कमाई देश में होती तो दीमकें चट कर जाती। देश को इन महापुरूषों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।
                 यह तो मेरा लोकपाल है। उस बैक ने को कह दिया कि लाकर धारक ने अखवार में लपेटकर रूपये रखे थे, इसलिए दीमकें चाट जाती है। लगता है दीमकें वहां अखवार पर पढनें आई थी, नोट देखकर उनके मुंह में पानी आ गया साफ है कि इस नुकसान का जिम्मेवार मीडिया भी है अखवार पर उसके आपत्ति जनक संवाद मुकदमा चलना चाहिए। सरकार क्या कहती है? क्या कोई मुकदमा चलेगा? यदि हां तो गवाह या मुजरिम के रूप में दीमकों को जिंदा रखना होगा। जिन्हें नोट खाने की आदत पड़ जाती है। उनकी भूख साधारण कागज से नहीं मिटती है। इसलिए उन्हें नोट चटवाकर ही जिंदा रखा जाए। विदेशी आतंकवादियों पर मुकदमा चलाने के लिये भी तो हम करोड़ों खर्चते हैं, दीमकें तो हमारी अपनी है। उनकी रगों में हमारे नोटों का खून है। उन्होंने हमारे बैंकों को पब्लिसिटी दी है। हां, उन्हें फांसी की सजा हरगिज न दी जाए। वरना लोगों को लगेगा कि इन धन आैर समय फिजूल ही खर्च हुआ है।

गोविंद शर्मा, ग्रामोत्थान विद्यापीठ,
संगरिया



Tuesday, 1 May 2012